कोविड टीकों की कवायद में समितियों की भूमिका (बिजनेस स्टैंडर्ड)

निवेदिता मुखर्जी 

कोविड टीके से जुड़ी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पिछले हफ्ते एक अधिकार-प्राप्त समूह का गठन किया गया। यह देश भर में कोविड टीके को भेजे जाने के ठीक पहले किया गया था। महामारी से जुड़े घटनाक्रम एवं इसकी रोकथाम से जुड़ी गतिविधियों पर करीबी नजर रखने वालों का कहना है कि सरकार ने यह पैनल इतनी देरी से क्यों बनाया है? लेकिन यह कोरोनावायरस और इसके संक्रमण को दूर रखने की कवायद से जुड़े तमाम सवालों में से महज एक है।

समिति का गठन कोविड का टीकाकरण शुरू होने के ऐन पहले होने से इसके समय के साथ इसके नाम पर भी सवाल उठते हैं। 'टीका प्रशासन पर अधिकार-प्राप्त समूह' के नाम वाले इस पैनल से असमंजस पैदा हो सकता है क्योंकि 'टीका प्रशासन पर राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह' का वजूद पहले से ही है। हालांकि सरकार ने स्थिति स्पष्ट करने के लिए ऐसे संकेत दिए हैं कि नए पैनल के गठन का असली मकसद 'को-विन' तकनीक प्लेटफॉर्म के सहज क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है। टीके की आपूर्ति एवं भंडारण पर नजर रखने के लिए को-विन प्लेटफॉर्म को विकसित किया जा रहा है। हालांकि इसके अलावा भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के पूर्व अध्यक्ष आर एस शर्मा की अगुआई वाला यह समूह एक सफल टीकाकरण कार्यक्रम चलाने के लिए जरूरी कदमों पर निर्णय ले सकता है। नीति आयोग के सदस्य वी के पॉल की अगुआई वाला 'टीका प्रशासन पर राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह' टीके के लॉजिस्टिक एवं ढांचागत पहलुओं पर भी ध्यान दे रहा है।


पॉल पैनल की पहली बैठक के बाद सरकार की तरफ से 12 अगस्त, 2020 को जारी बयान ने कहा था, 'विशेषज्ञ समूह ने टीके की खेप के प्रबंधन एवं आपूर्ति व्यवस्था पर नजर रखने के लिए एक डिजिटल ढांचा खड़ा करने की संकल्पना एवं उसके क्रियान्वयन पर विस्तार से चर्चा की। आखिरी मुकाम तक टीका पहुंचाने पर खास जोर रहेगा। आपूर्ति प्लेटफॉर्म एवं कोल्ड चेन के उपलब्ध विकल्पों और कोविड टीका जारी करने से जुड़े ढांचे पर भी चर्चा हुई।'


क्या इसका यह मतलब है कि दोनों विशेषज्ञ समूहों के कामों के बीच टकराव हो सकता है? ऐसी स्थिति पैदा होने का पहले ही अंदाजा लगाकर दोनों समूहों के बीच एक पुल बनाने की कोशिश की गई है। कैबिनेट सचिवालय के आदेश से गठित इन दोनों समूहों में आर एस शर्मा का नाम समान है। नए पैनल के प्रमुख बनाए गए शर्मा अगस्त में गठित पॉल पैनल में भी सदस्य के तौर पर शामिल थे। विदेश, वित्त एवं स्वास्थ्य मंत्रालयों के सचिवों वाले पॉल पैनल को नीतिगत समूह बताया जा रहा है। वहीं शर्मा समिति का मिजाज तकनीकी समर्थन देने वाला है।


कोविड महामारी का प्रकोप फैलने के साथ ही कई समितियों का गठन हुआ था। सवाल है कि क्या इन समितियों की अब भी किसी-न-किसी रूप में बैठक होती है? लॉकडाउन का ऐलान होने के फौरन बाद 29 मार्च तक ही 11 समितियां बनाई जा चुकी थीं। जहां इनमें से कुछ समितियों की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है लेकिन दूसरी समितियां अब भी प्रासंगिक हो सकती हैं। सभी 11 समितियां असल में गृह मंत्रालय द्वारा गठित अधिकार-प्राप्त समूह थीं। मेडिकल आपात प्रबंधन योजना; अस्पताल की उपलब्धता, आइसोलेशन एवं क्वारंटीन सुविधा; पीपीई किट, मास्क एवं वेंटिलेटर जैसे चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना; मानव संसाधन के बेहतर इस्तेमाल; खानपान एवं दवा की आपूर्ति शृंखला एवं लॉजिस्टिक सुविधा मुहैया कराना; निजी क्षेत्र के साथ तालमेल बिठाने; आर्थिक एवं कल्याणकारी उपायों और कोविड के बारे में जन जागरूकता फैलाने के लिए अलग-अलग समूह बनाए गए थे।


इतने सारे समूह एवं समितियां बनाए जाने के बावजूद सवाल बदस्तूर कायम हैं। मसलन, टीकाकरण पर सरकार को आने वाली लागत अब भी एक रहस्य क्यों बनी हुई है? क्या यह सच है कि सरकार टीका निर्माताओं से कीमत कम करने के बारे में बात करती रही है लेकिन इस मामले में आखिरी बात क्या हुई है? क्या समय बीतने पर भारत में कोविड के कई टीके आ जाएंगे? बाजार में ये टीके कब तक उपलब्ध हो पाएंगे और उनकी कीमत क्या होगी?


यह सवाल भी है कि तमाम चुनौतियों एवं मुश्किलों के बावजूद काम कर रहे कारखाना श्रमिकों एवं अन्य लोगों को भी टीका लगाने की क्या कोई योजना है? महामारी से जंग में अग्रिम मोर्चे पर तैनात लोगों एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के साथ ही इंडिया इंक को सक्रिय रखने वाले लोगों को भी टीके की प्राथमिकता सूची में जगह देनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था को फिर से झटका न लगे। वर्ष 2020 के दौरान कारखानों को कोविड संक्रमण के मामले बढऩे पर बार-बार बंद करना पड़ा था। कामगारों को प्राथमिकता के आधार पर टीका लगाया जाता है तो फिर उद्योग जगत में गतिरोधों को कम किया जा सकेगा। उसके लिए कई कंपनियां टीकाकरण की लागत उठाने को भी तैयार होंगी। लेकिन सरकार को ऐसी योजना पर कारोबारी दिग्गजों की बात भी सुननी होगी।


वैश्विक आख्यान है कि कोविड को दीर्घकालिक महामारी बनने से रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाने चाहिए। त्वरित टीकाकरण से महामारी की अवधि को छोटा किया जा सकता है और वायरस को फैलने से रोका जा सकता है। भारत को इस राह पर चलने के लिए हर काम करना होगा, चाहे इसके लिए उसे कई समूह एवं समितियां ही क्यों न बनानी पड़ें? एक बार लक्ष्य हासिल हो जाने पर सवालों को अपने-आप सही जवाब मिल जाएंगे।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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About न्यूज डेस्क, नई दिल्ली.

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