योगेंद्र नारायण, पूर्व महासचिव, राज्यसभा
सर्वोच्च न्यायालय ने नए कृषि कानूनों पर केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच चल रही तकरार को सुलझाने की ठोस पहल की है। कानूनों के अमल पर फौरी तौर पर रोक लगाना और चार सदस्यों की एक समिति का गठन बताता है कि अदालत तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कानूनों को देखना चाहती है। टकराव के कारण बिगड़ रहे हालात को संभालने की वह मंशा रखती है, और हर हाल में शांति की बहाली की हिमायती है। ताजा फैसले से यह संदेश भी निकलता है कि केंद्र सरकार और किसान, दोनों को अदालत यह मौका दे रही है कि वे चार कृषि विशेषज्ञों की नजर से कानूनों को परखें और यदि इनमें संशोधन की दरकार है, तो उन्हें जल्द से जल्द अमल में लाएं, ताकि टकराव टाले जा सकें।
फिर भी कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब ढूंढ़ा जाना चाहिए। खासकर कानूनों का प्रबंधकीय पक्ष काफी उलझा हुआ है। मसलन, इन कानूनों पर भला किस तरह से रोक लगाई जा सकेगी? उल्लेखनीय है कि ये कानून जून, 2020 से लागू हो चुके हैं। केंद्रीय कानून होने के कारण देश के सुदूर हिस्सों तक पर ये आयद हैं। अब कागजी तौर पर भले ही इन पर रोक लग गई है, लेकिन जमीन पर इससे जुड़ी व्यवस्था को बंद करना आखिर कैसे संभव है? इन कानूनों के लागू होने से पहले भी निजी डीलर सक्रिय रहे हैं। किसानों से वे कृषि उत्पाद खरीदते रहे हैं। नए कानूनों में सिर्फ उनकी हैसियत को स्वीकार किया गया था। इसलिए अगर इन कानूनों पर रोक लगी भी है, तो बाजार में निजी डीलर का मौजूदा तंत्र शायद ही ध्वस्त हो सकेगा। यही नहीं, किसानों द्वारा अपनी मर्जी से फसल उत्पाद बेचने की व्यवस्था भी नहीं रोकी जा सकती। अरसे से वे बाजार में निजी कारोबारियों को अपने उत्पाद बेचते रहे हैं, और सौदा न पटने पर किसी दूसरे कारोबारी के पास जाते रहे हैं। वायदा खेती भी पहले से ही जारी है। हां, नए कानूनों में यह प्रावधान किया गया था कि ऐसे किसी समझौते में कारोबारी किसानों से उनकी जमीन नहीं खरीद सकते। जाहिर है, नए कानून में किसानों के हक की ही बात थी। मगर अब इस पर भी रोक लग गई है, यानी इस नए अदालती फैसले के बाद वायदा खेती से किसानों की हैसियत में कोई सुधार नहीं हो सकेगा। देखा जाए, तो इन कानूनों को लागू करने में सरकार की कोई भूमिका थी भी नहीं। वह सिर्फ कारोबारियों और किसानों के बीच कड़ी का काम कर रही थी। मसलन, किसान यदि शिकायत करता कि वायदे के मुताबिक कारोबारी ने उसे पैसे नहीं दिए या शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो सरकारी संस्थाएं उस कारोबारी को वायदा खेती से जुड़ी शर्तों को मानने के लिए बाध्य करतीं। इसलिए कानूनों के मुताबिक जिन प्रावधानों के अमल का भरोसा सरकार ने दिया था, वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लागू रहेंगे। तो फिर आगे होगा क्या? शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में चार जहीन लोगों की एक समिति बनाई है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिंदर सिंह मान, जाने-माने कृषि विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान के प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और शेतकरी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवत इसके सदस्य हैं। ये सभी खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों से भली-भांति परिचित हैं। अदालती फैसले के मुताबिक अब यह समिति कानूनों में मौजूद खामियों को देखेगी और यह तय करेगी कि इनमें कहां-कहां संशोधन की दरकार है। समिति के गठन से अब इन कानूनों की तमाम गड़बड़ियां सार्वजनिक हो सकेंगी और आम लोगों को भी यह पता चल सकेगा कि इनमें किस तरह के सुधार होने चाहिए। मगर इसमें एक पेच है। सरकार इस तरह की समिति के गठन की बात पहले से करती रही है, जबकि किसान संगठन इसके खिलाफ थे। इसका मतलब है कि शीर्ष अदालत ने एक तरह से सरकार का पक्ष मजबूत माना है। वह इससे सहमत दिख रही है कि गड़बड़ियों को दुरुस्त करना ही मुफीद होगा। यही बात किसान संगठनों को नागवार गुजर रही है। नतीजतन, ज्यादातर किसान संगठनों ने इस समिति के सामने न जाने का फैसला लिया है। इसका अंदेशा था भी, क्योंकि समिति के सामने जाने पर यह संदेश जाएगा कि वे इन कानूनों के पक्ष में हैं और सुधार चाहते हैं, जबकि तीनों कानूनों को खत्म करने की मांग पर वे शुरू से अडे़ हुए हैं।
समिति के सामने यदि किसान संगठन नहीं पहुंचे, तो इससे सर्वोच्च न्यायालय की छवि को धक्का लग सकता है। एकाध कृषक संगठन ने समिति पर हामी भरी है, लेकिन उनका जाना या न जाना शायद ही मायने रखेगा। इसका साफ-साफ अर्थ है कि अदालत के रास्ते इस मामले को अंजाम तक पहुंचाना दिवा-स्वप्न साबित हो सकता है। अदालत किसानों के प्रति जरूर सहानुभूति रखती दिख रही है, लेकिन समाधान देश की संसद ही निकालेगी। हां, सरकार समिति की सिफारिशों को मान सकती है, क्योंकि सरकारी संस्थान होने के नाते उसके लिए अदालत का आदेश मानना अनिवार्य है। यहां बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की याद स्वाभाविक तौर पर हो आती है। इस विवाद को सुलझाने के लिए शीर्ष अदालत ने पहले कुछ न्यायाधीशों और जहीन लोगों की एक समिति बनाई थी, ताकि तमाम पक्षों में सहमति बन जाए। मगर जब ऐसा न हो सका, तो फिर अदालत की पीठ ने तथ्यों के आधार पर स्वयं फैसला सुनाया, जिसे सभी पक्षों ने खुले दिल से स्वीकारा। इस मामले में भी ऐसा कुछ हो सकता है। समिति की सिफारिशों पर गौर करते हुए अदालत आने वाले दिनों में कुछ इस तरह का फैसला दे सकती है, जो इस विवाद को सुलझाने में मील का पत्थर साबित हो। फिलहाल हमें उसी दिन का इंतजार करना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सौजन्य - हिन्दुस्तान।
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