लेकिन सवाल है कि क्या पाकिस्तान ऐसा करने वालों के खिलाफ कोई कदम उठाएगा? यह पहला मौका नहीं है जब पाकिस्तान में भीड़ ने किसी मंदिर को ढहा दिया हो। अब तक पाकिस्तान में सैकड़ों मंदिरों के साथ यही हुआ है। गुजरे बुधवार को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के करक जिले के टेरी गांव में भीड़ ने जिस मंदिर को ढहा दिया, उसे गिराने की कोशिशें पहले भी हो चुकी हैं।
इससे साफ है कि यह मंदिर लंबे समय हमलावरों के निशाने पर था। इस गांव में राजनीतिक पार्टी जमीयत उलेमा-ई-इस्लाम-फज्ल की रैली में कट्टरपंथी नेताओं ने भीड़ को मंदिर ढहाने के लिए उकसाया। हैरत की बात तो यह है कि यह इलाका प्रधानमंत्री इमरान खान का है।
इस घटना से यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि जब प्रधानमंत्री के अपने प्रांत में अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने से लोग नहीं डर रहे तो देश के दूसरे हिस्सों में क्या आलम होगा!
ताजा घटना से साफ है कि मंदिर को गिराने का यह कृत्य सुनियोजित था। यह भी सच्चाई है कि कहीं भी स्थानीय लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम नहीं देते हैं। वरना अब तक को यह मंदिर कभी का साफ हो चुका होता। दूसरे धर्मों के लोगों के प्रति घृणा फैलाने का काम कट्टरपपंथी ताकतें ही करती हैं। ऐसी ताकतों को सत्ता का पूरा संरक्षण हासिल रहता है।
मंदिर या दूसरे धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने के मामले में आज तक किसी के भी खिलाफ कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा देखने में नहीं आया है। दरअसल धार्मिक स्थलों पर हमले और जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाओं को अंजाम इसलिए दिया जाता है ताकि अल्पसंख्यक समुदायों में दहशत बनी रहे, वे डरे-सहमे रहें और अपने अधिकारों को लेकर कोई मांग न करें, सरकार के खिलाफ आवाज न उठा सकें।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ऐसी घटनाओं को पाकिस्तान सरकार की मौन स्वीकृति होती है। धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने, अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करने जैसी घटनाएं किसी भी सभ्य देश की पहचान नहीं होतीं। इनसे देश में भाईचारा पैदा नहीं देता। लोगों को आपस में लड़ा कर सरकारें अपने हित साधती हैं। जो देश अपने को मजबूत लोकतंत्र होने का दावा करते हैं उनमें तो इस तरह की घटनाएं और शर्मनाक हैं।
अपने नागरिकों को धार्मिक आजादी प्रदान करने के मामले में वैसे भी पाकिस्तान बदनाम मुल्क के रूप में जाना जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र से लेकर अमेरिका और दूसरे देश भी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं।
यहां तक कि पाकिस्तान का मानवाधिकार आयोग तक कह चुका है कि आने वाले वक्त में यहां धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति और खराब होगी। पाकिस्तान के संविधान ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी समान अधिकार देने की बात कही है। लेकिन आज पाकिस्तान सरकार अपने ही संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए अल्पसंख्यकों उत्पीड़न कर रही है।
धार्मिक स्थलों पर हमलों की नीति के बजाय अगर पाकिस्तान सरकार दशकों से बंद पड़े मंदिरों और गुरद्वारों को फिर से खुलवाने की दिशा में बढ़े, तो इससे अल्पसंख्यकों के भीतर भी सरकार के प्रति भरोसा पैदा बनेगा और ऐसी कवायद भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। लेकिन क्या पाकिस्तान इस बात को समझ पाएगा, यह बड़ा सवाल है।
सौजन्य - जनसत्ता।
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