प्रेमवीर दास
पिछले कुछ दिनों में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर लगातार कुछ न कुछ कहा है। देश की विदेश नीति के प्रभारी एवं रणनीतिक मामलों के जानकार दोनों की हैसियत से उनकी कही गई बातें महत्त्वपूर्ण हैं। इस समय देश में जयशंकर की तरह इन मामलों में विशेष जानकारी रखने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही हैं। ऐसे में उन्होंने जो कहा है उनसे चार महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहली बात तो यह कि हिंद-प्र्रशांत बीते हुए कल की वास्तविकता थी, न कि आने वाले कल की जरूरत है। दूसरी अहम बात यह है कि अब देश की रक्षा एवं रणनीतिक पहलुओं से जुड़े मामलों में समुद्री क्षेत्र की अहमियत अधिक है। एक और महत्त्वपूर्ण बात उन्होंने यह कही है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत को एक अहम किरदार निभाना चाहिए था और चौथी बात यह है कि भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने हितों का तालमेल समान सोच रखने वाले दूसरे देशों के हितों के साथ बैठाना है।
एक अन्य ध्यान आकृष्ट करने वाला बयान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) ने दिया है। उन्होंने मैरीटाइम थियेटर बनाने की हिमायत की है। ऐसा लगता है कि इसमें मौजूदा पूर्वी एवं पश्चिमी नौसेना कमान के साथ तीनों सेना की अंडमान एवं निकोबार कमान भी शामिल होंगी। इस थियेटर का आकार कितना होगा फिलहाल यह मालूम नहीं है, लेकिन समुद्र में तमाम बातों की स्वतंत्रता बनाए रखने, व्यापार के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (एचएडीआर) पर मोटे तौर पर चर्चा चल रही है। इस लिहाज से किसी शत्रु का नाम या उसकी पहचान नहीं की गई है, लेकिन ऐसा समझा जा रहा है कि चीन और पाकिस्तान पर ही नजरें हैं।
जयशंकर और विपिन रावत इन दोनों में किसी के भी वक्तव्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। बस चर्चा का एक ही विषय है कि भारत कितना सक्षम है। सामुद्रिक शक्ति का महत्त्व केवल नौसेना तक ही सीमित नहीं है बल्कि विदेश व्यापार, एचएडीआर और दूसरे देशों से संपर्क आदि सभी लिहाज से भी यह उतना ही अहम हैं। अब यह बात भी स्पष्ट है कि जब तक हिंद महासागर क्षेत्र में भारत अपनी क्षमताएं नहीं बढ़ाता है और एक विश्वसनीय एवं उपयोगी साझेदार के तौर पर अपनी छवि विकसित नहीं करता है तब तक इन उत्तरदायित्वों का पालन नहीं किया जा सकता है। यह कुछ कारकों पर निर्भर करता है। इसमें कुछ कारक परिवर्तनशील हैं और कुछ नहीं बदले जा सकते हैं। इन नहीं बदलने वाले कारकों में पहला भूगोल है। आम तौर पर चारों तरफ से जमीनी सीमा से घिरे देश सागर में अपनी ताकत स्थापित करने की पहल नहीं करते हैं। जिन देशों की कुछ तटीय सीमाएं हैं उनकी पहुंच भी खुले जल तक होनी चाहिए। जर्मनी, फ्रांस, रूस सभी के पास बड़ी नौसेनाएं हैं लेकिन वे अब तक समुद्र में अपनी विश्वसनीय ताकत स्थापित नहीं कर पाए हैं। दो शताब्दी पहले ब्रिटेन ने ट्राफ ल्गर और नील की लड़ाई में फ्रांस को शिकस्त दी थी, जबकि उस समय जहाजों के मामले में फ्रांस ब्रिटेन पर भारी पड़ रहा था। रूस का बेड़ा 1917 में बाल्टिक सागर से लेकर सी ऑफ जापान तक जा सकता था, बावजूद इसके उसे जापान के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी। जर्मनी ने टिरपिट्ज और बिस्मार्क जैसे शक्तिशाली लड़ाकू जहाज बनाए थे लेकिन इनसे वह अटलांटिक सागर में अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाया। दूसरी तरफ ब्रिटेन की नौसेना ने तीन शताब्दियों तक समुद्री क्षेत्र में अपनी ताकत का पंचम लहराया और जापान ने अमरिका जैसे शक्तिशाली देश के नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर हमला करने में सफल रहा। यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया ने भी कोरिया और वियतनाम की लड़ाई में अपना योगदान दिया। ये तीनों देश टापू राष्ट्र कहलाते हैं। अमेरिका की उत्तरी सीमा कनाडा से लगती है और दक्षिण में मैक्सिको से इसकी जमीनी सीमा लगती है लेकिन इसके पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं में अथाह समुद्र है, जिससे यह दुनिया में सबसे बड़ी ताकतवर नौसेना रखता है।
इन बातों के अलावा अपनी पहचान बनाने की सरकार की इच्छाशक्ति भी समुद्री क्षेत्र में ताकत बढ़ाने में मददगार होती है। केवल इच्छा शक्ति की बदौलत ही विदेश में कोई देश अपनी नौसेना तैनात कर सकता है। इसी जज्बे के दम पर मागे्र्रट थैचर ने ब्रिटेन से 8,000 मील दूर विमान वाहक पोत एचएमएस हर्मिस (जो बाद में आईएनएस विराट बन गया)सहित अपनी नौसेना तैनात कर दी और वहां छोटे-छोटे द्वीपों को 'आजाद' कराया। ये द्वीप ब्रिटेन का झंडा रखते थे, लेकिन उन पर अर्जेंटीना का नियंत्रण था। इसके बाद फॉकलैंड्स के युद्ध में अर्जेंटीना ने ब्रिटेश के कुछ जहाज डुबो दिए औैर इसमें उसे भी अपने एक जहाज से हाथ धोना पड़ा। हालांकि बाद में ब्रिटेन की ताकतवर नौसेना के आगे इसे आत्मसमर्पण करना पड़ा। फॉकलैंड्स अर्जेंटीना के तट से महज 200 मील दूर था। इस तरह, अपनी ताकत बढ़ाने और इसे साबित करने की इच्छा शक्ति किसी देश की नौसेना की ताकत का निर्धारण करते है। अब अहम सवाल खड़ा होता है कि भारत इस पैमाने पर कहां है? हमारे देश की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह तीन दिशाओं से समुद्र से घिरा है और दूर सागर में कई द्वीप भी हैं जो हमारी शक्ति में इजाफा करते हैं। जहां तक क्षमताओं की बात है तो उत्तरी भाग और हिंद महासागर क्षेत्र में एचएडीआर के मामले में हमें पहला कदम उठाने वाले देश के रूप में काम करना होगा। समुद्र में माल की आवाजाही सुचारु रूप से जारी रखने के लिए हमें दूसरे देशों के साथ संपर्क करना होगा, जैसा कि सोमालिया में समुद्री डाकुओं के बढ़ते उत्पात के बाद हुआ था। जिन बिंदुओं पर हम कमजोर हैं वहां अपनी ताकत बढ़ाने की हमारे पास पर्याप्त क्षमता है। समुद्र में एकीकृत वायु शक्ति एक ऐसा ही बिंदु है। किसी भी समय हमारे आस-पास गहरे समुद्री क्षेत्र में दो विमानवाहन युद्ध पोत किसी तरह की कार्रवाई के लिए हमेशा तैनात करने की जरूरत है। वैसे आवश्यकता तीन विमान वाहक युद्धपोतों की है।
उम्मीद की जा रही है कि विमानवाहक युद्ध पोतों की संख्या 2023 तक दो हो जाएगी, जो इस समय केवल एक है। विक्रांत का कोच्चि में इस समय निर्माण हो रहा है और तब तक यह समुद्र में उतार दिया जाएगा। हालांकि तीन युद्धपोतों का सपना फिलहाल पूरा होता नहीं दिख रहा है। एचएडीआर कार्यों में अक्सर उपयोग साबित होने वाले तटरक्षक बलों की क्षमता भी बढ़ाने की जरूरत है। रक्षा बजट में नौसेना का हिस्सा 1987 में 13 प्रतिशत था, जो बाद में बढ़कर 18 प्रतिशत हो गया, लेकिन अब यह फिर कम होकर 14 प्रतिशत तक रह गया है। बात केवल रक्षा बजट की करें तो यह पिछले छह वर्षों में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2 प्रतिशत से अधिक नहीं पहुंच पाया है और कम से कम अगले दो वर्षों में इसमें किसी बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वास्तविकता यह है कि भारत की नौसेना की क्षमता उतनी नहीं हो पाएगी जितनी जरूरत है। जहां तक सरकार की इच्छा शक्ति की बात है तो केवल 1987 में ही सरकार ने श्रीलंका में शांति रक्षक सेना भेजी थी। इसका उद्देश्य तमिलों की मदद करना था, लेकिन आखिरकार उन्हीं से लड़ाई करनी पड़ी। अंत में अपनी साख गंवाने के बाद भारत ने शांति रक्षक बल बुला लिया। अगर हम जयशंकर और सीडीएस द्वारा कही गई बातों को वास्तविकता के धरातल पर उतारना चाहते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक विश्वसनीय भूमिका निभाने के इच्छुक हैं तो हमें अपनी मौजूदा क्षमता में और इजाफा करना होगा। चीन की तरह भारत भी समुद्र में अपनी सामरिक शक्ति बढ़ाने में अधिक आगे नहीं रहा है, लेकिन चीन ने अपनी गलती सुधारनी शुरू कर दी है। भारत ने अभी इस दिशा में पूरी तरह सोचना भी शुरू नहीं किया है।
(लेखक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। )
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
0 comments:
Post a Comment