कानूनी सुरक्षा की आड़ में आम आदमी के जीवन से खिलवाड़ (अमर उजाला)

शिवदान सिंह 

भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के अनुसार, यदि किसी अपराध को एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा अंजाम दिया जाए, तो अपराध में शामिल हर व्यक्ति समान सजा का हकदार होता है। जब कोई सार्वजनिक भवन या पुल आदि घटिया निर्माण सामग्री के इस्तेमाल के कारण समय सीमा से पहले ही ध्वस्त होते हैं, तो उपरोक्त कानून के अनुसार, इन भवनों और पुलों के ठेके में रिश्वत खानेवाले अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चलाए जाने चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। अक्सर दिखावे के लिए संबंधित अधिकारी का या तो तबादला कर दिया जाता है या सस्पेंड कर दिया जाता है। पिछले दिनों गाजियाबाद के पास मुरादनगर श्मशान घाट भवन की छत गिरने से सत्ताईस लोगों की मौत हो गई। ठेकेदार के मुताबिक, भवन के ठेके की धनराशि का 28 प्रतिशत हिस्सा वह पहले ही मुरादनगर के नगरपालिका अधिशासी अधिकारी को रिश्वत के रूप में दे चुका था। फिर अन्य निरीक्षकों को 12 फीसदी हिस्सा दिया गया। बचे हुए 60 फीसदी में से अपना मुनाफा कमाने के बाद उसने 40 प्रतिशत धनराशि से इस भवन का निर्माण किया। घटिया भवन सामग्री लगाने का परिणाम हुआ कि अचानक वह भवन गिर गया। ऐसे ही महाराष्ट्र के भंडारा में एक अस्पताल में आग लगने से दस नवजातों की मौत हो गई।


अक्सर जहरीली शराब पीने से लोगों के मारे जाने की खबर आती है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जहरीली शराब पीने से पांच लोगों की मौत हो गई और बीस लोगों की आंखों की रोशनी चली गई। फरवरी, 2019 में उत्तर प्रदेश के तीन जिलों सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ में जहरीली शराब पीने से करीब सौ लोगों की जान चली गई थी और बहुत लोगों की आंख की रोशनी चली गई थी। जहरीली शराब से पंजाब में भी समय-समय पर लोग मारे जाते हैं। पर अभी तक पुलिस व आबकारी विभागों के दोषी लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। जबकि जहरीली शराब का धंधा संगठित अपराधी करते हैं, जिसमें इलाके के पुलिस और आबकारी कर्मियों की पूरी सहमति और मदद उपलब्ध रहती है। ज्यादातर ऐसे मामलों में दोषी पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया जाता है या सस्पेंड कर दिया जाता है। जबकि सस्पेंशन की अवधि तक दोषी पुलिसकर्मी पूरे वेतन और सुविधाओं के साथ कुछ दिन आराम कर फिर किसी दूसरी जगह भ्रष्टाचार में लिप्त हो मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ करने लगता है। साफ है कि हमारी कानून-व्यवस्था में ऐसी कुछ खामियां हैं, जिनके कारण भ्रष्ट सरकारी कर्मियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हो पा रही।


सरदार पटेल ने अंग्रेजों द्वारा लागू सिविल सर्विस कोड 1919, पुलिस ऐक्ट 1861 तथा उनके पूरे कानूनी ढांचे को यह समझ कर अपना लिया था कि इनके जरिये अंग्रेजों की तरह आजाद भारत की सरकारें भी कामकाज चला सकेंगी। पर अंग्रेजों का काम नौकरशाहों व पुलिस की मदद से भारतीयों का शोषण करना था। स्वतंत्र भारत में तो ऐसा नहीं होना चाहिए। लेकिन पुलिस और नौकरशाह अंग्रेजों द्वारा प्राप्त सरकारी कर्मियों की कानूनी सुरक्षा का नाजायज लाभ उठा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 310 और 311 के अनुसार, नौकरशाहों के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले केंद्र या संबंधित राज्य सरकार की अनुमति लेनी पड़ती है। ऐसे ही पुलिसकर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए सीआरपीसी की धारा 132 और 197 के अनुसार संबंधित राज्य सरकार की अनुमति लेना जरूरी है। ये प्रावधान इसलिए किए गए थे, ताकि नौकरशाह और पुलिसकर्मी बिना किसी दबाव के अपना दायित्व निभा सकें। पर इन प्रावधानों को सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार और अव्यवस्था को बनाए रखा गया है। जबकि सैन्य कानून में प्रावधान है कि हर तरह की गतिविधियों के लिए सेना की यूनिट का संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होगा। दोषी सेनाधिकारी के खिलाफ कोर्ट मार्शल के जरिये कानूनी कार्रवाई की जाती है और दोषी पाए जाने पर लंबी सजा या फांसी तक का प्रावधान है। लिहाजा देश के नौकरशाहों और अन्य सरकारी कर्मचारियों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराने का समय अब आ गया है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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About न्यूज डेस्क, नई दिल्ली.

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