सर्वोच्च अदालत सरकार से कहती रही है कि वह आंदोलनकारी किसानों से वार्ता कर मसले का उचित समाधान निकाले। लेकिन केंद्र की ओर से ऐसे प्रयास होते नहीं दिखे। अगर आठ दौर की वार्ताओं में भी सरकार कोई ऐसा रास्ता निकाल पाने में समर्थ नहीं हुई जिससे आंदोलन खत्म कर किसान घरों को लौट जाएं तो यह व्यवस्था पर ही बड़ा प्रश्नचिह्न है।
साफ है कि सरकार की मंशा आंदोलनकारी किसानों की बात सुनने और समस्या का हल निकालने की शायद नहीं है, बल्कि वह यह मान कर बैठ गई है कि एक न एक दिन किसान थक-हार कर लौट जाएंगे। वार्ताओं के लिए तारीखें देने के अलावा सरकार ने अपनी ओर से ऐसी कोई गंभीर और ठोस पहल नहीं की जिससे लगा हो कि वह इस समस्या का हल निकालना चाहती है। इसीलिए सोमवार को प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए बोबडे की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने सख्त लहजे में सरकार को चेताया। अदालत ने साफ कर दिया कि अगर जरूरत पड़ी तो वह इन कानूनों के अमल पर रोक भी लगा देगी। सर्वोच्च अदालत के रुख से इतनी उम्मीद तो बंधी है कि इस समस्या का अब कोई उचित और तार्किक समाधान निकलेगा।
नए कृषि कानूनों को लेकर शुरू से आवाजें उठती रही हैं। जिस हड़बड़ी में पहले अध्यादेश लाया गया और फिर कानून बना कर लागू कर दिए गए, उससे किसान तो क्या सभी के मन में संहेह पैदा हुए हैं। आखिर किसानों को ऐसा क्यों लग रहा है कि ये नए कानून उनके हितों के खिलाफ हैं और कुछ उद्योग घरानों के हितों के लिए बनाए गए हैं? ऐसा लगता है कि कहीं कुछ ऐसा जरूर है जिसे किसान भी समझ रहे हैं और सरकार छिपा रही है।
देश भर के लाखों किसान किसी राजनीतिक दल या विपक्ष के बहकावे में आकर इतना बड़ा और सख्त कदम उठा लें, ऐसा संभव नहीं है। किसानों की मांगों पर विचार के लिए सरकार अपने प्रतिनिधियों, कृषि मामलों के जानकार विपक्षी नेताओं, कृषि विशेषज्ञों और किसान संगठनों के नुमाइंदों की समिति ही बना देती और वह समिति किसानों की मांगों पर गंभीरता से विचार करती तो समाधान की दिशा में बढ़ने का रास्ता निकलता। पर ऐसा नहीं हुआ। इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने समझा है।
अदालत भी यह देख रही है कि अगर किसान इस कदर उद्वेलित हैं तो जाहिर है कि नए कृषि कानूनों में कुछ तो ऐसा है जो उनके हितों के खिलाफ है। इसलिए अदालत ने कृषि कानूनों और किसानों के आंदोलन के संबंध में आदेश पारित करने की बात भी कही। साथ ही अदालत ने इस मामले पर विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीशों की एक समिति बनाने की बात भी कही है।
सरकार और किसान संगठनों के बीच अब अगली वार्ता पंद्रह तारीख को होनी है। लेकिन अब तक का अनुभव यही बता रहा है कि इस वार्ता का भी कोई नतीजा निकलना, क्योंकि न तो सरकार कृषि कानूनों को वापस लेने और न न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी देने का संकेत दे रही है। किसान संगठन इन दोनों मांगों के बिना आंदोलन खत्म नहीं करने वाले। फिर, कई राज्य भी इन कृषि कानूनों के खिलाफ हैं और वे अपने यहां इन्हें लागू करने से साफ इंकार कर चुके हैं। इससे यह तो साफ है कि नए कृषि कानूनों को मौजूदा स्वरूप में अमल में लाने की सरकार की जिद कहीं ज्यादा बड़े टकराव को जन्म दे सकती है। ऐसे में अब उम्मीद सर्वोच्च न्यायालय के प्रयासों से ही जगती है।
सौजन्य - जनसत्ता।
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