राम यादव
लड़कियों-महिलाओं की सुरक्षा दुनिया में हर सरकार के लिए अग्निपरीक्षा बन गई है। तब भी ऐसी कोई सरकार शायद ही मिलेगी, जो नारी-सुरक्षा के किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर बड़े उत्साह से हस्ताक्षर करने के दसवें साल में उसे बेशर्मी से ठुकरा दे। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने यही किया है। आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उन्होंने कहा, 'औरत सबसे पहले मां है और बच्चे के लिए उसका घर है।' शायद वह यही कहना चाहते थे कि औरतों को घर पर ही रहना और बच्चों की देखभाल करना चाहिए, न कि नौकरी-धंधे के लिए घर से बाहर जाना चाहिए। मुश्किल से दस दिन बाद 19 मार्च की रात उन्होंने अध्यादेश जारी किया कि उनका देश महिलाओं की सुरक्षा-संबंधी 'इस्तांबुल कन्वेशन' से अपने आप को मुक्त कर रहा है। महिलाओं के साथ हिंसा की रोकथाम और ऐसी हिंसा से लड़ने का यह समझौता तुर्की के ही सबसे बड़े शहर इस्तांबुल में हुआ था। तुर्की ही पहला देश था, जिसने 11 मई, 2011 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। अब वही इससे मुकरने वाला पहला देश भी बन गया है।
यह समझौता पांच मई, 1949 को लंदन में बनी 'यूरोपीय परिषद' के तत्वावधान में हुआ था। फ्रांस के श्त्रासबुर्ग में स्थित मुख्यालय वाली इस संस्था का मुख्य काम है यूरोपीय हित के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर बहस के लिए मंच प्रदान करना और आर्थिक-सामाजिक प्रगति हेतु उनके बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना। तुर्की सहित 47 देश इस संस्था के सदस्य हैं। 45 देशों तथा यूरोपीय संघ ने 'इस्तांबुल कन्वेशन' की विधिवत पुष्टि की है। तुर्की के क्षेत्रफल का तीन प्रतिशत और जनसंख्या का पांच प्रतिशत यूरोपीय महाद्वीप पर होने के कारण वह अपने आप को एक यूरोपीय देश बताने में बहुत गर्व महूसस करता है। कुल जनसंख्या है सवा आठ करोड़।
र्की की महिलाएं अपने साथ बढ़ते हुए दुराचारों और असुरक्षा के कारण पिछले दिनों जगह-जगह प्रदर्शन कर रही थीं। महिलाओं की सुरक्षा वाले 'इस्तांबुल कन्वेशन' को त्याग देने के समाचार के बाद उनके बीच और अधिक बेचैनी फैल गई है। ऐसे ही एक प्रदर्शन के समय इस्तांबुल की 50 वर्षीय सेमा ने जर्मन टेलीविजन चैनल 'एआरडी' से कहा,'पिछले दो वर्षों में मर्दों ने इतनी सारी औरतों को मार डाला है कि हमें अपने बचाव के लिए सड़कों पर उतरना ही पड़ा।' 'इस्तांबुल कन्वेशन'अपने ढंग का ऐसा पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो हस्ताक्षरकर्ता देशों से कानून बनाकर, शिक्षा द्वारा तथा सामाजिक जागरूकता फैला कर महिलाओं को हर प्रकार की सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहता है।
राष्ट्रपति एर्दोगन खुद इस्लामी रूढ़िवादी तो हैं ही, उनकी पार्टी 'एकेपी' के कई नेता व सांसद 'करेला नीम चढ़ा' से कम नहीं हैं। वे एर्दोगन पर दबाव डाल रहे थे कि 'इस्तांबुल कन्वेशन' का हिस्सा होना तुर्की जैसे एक इस्लामी देश के लिए शोभा नहीं देता। दो उदाहरण कि तुर्की का रंग-ढंग कैसा हैः जुलाई 2020 में तुर्की के मेन्तेसे जिले में पीनार ग्युल्तेकेन नाम की एक युवती का शव मिला। हत्यारे ने गला दबा कर उसे मार डाला था और शव को कूड़े के एक ड्रम में डाल कर जला दिया था। हत्यारा एक नाइट क्लब का 32 वर्षीय मालिक था। पुलिस से उसने कहा कि उसने पीनार को इसलिए मारा, क्योंकि वह उससे अलग होना चाहती थी।
तुर्की के एशियाई हिस्से के एक गांव में 18 साल की एक युवती ईपेक एर की कब्र है। उसके एक दोस्त ने उसके साथ बलात्कार किया था। पुलिस ने बलात्कारी को पकड़ा तो सही, पर अदालत ने जल्द ही छोड़ दिया। निराश ईपेक एर ने आत्महत्या की कोशिश की, पर घायल होकर मृत्युपर्यंत कई सप्ताह अस्पताल में कराहती रही। तुर्की की विपक्षी पार्टियां कह रही हैं कि 'इस्तांबुल कन्वेशन' की संसद ने पुष्टि की थी। इसलिए केवल संसद ही उससे मुक्त होने की पुष्टि कर सकती है। विपक्षी पार्टियां कुछ भी कहें, तुर्की में होता वही है, जो तुर्की का सुल्तान बनने के महत्वाकांक्षी वहां के राष्ट्रपति जहांपनाह रजब तैयब एर्दोगन चाहते हैं।
सौजन्य - अमर उजाला।
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